ग़ज़ल : हुस्न तेरा इक...

हुस्न तेरा इक जलता दरिया
इश्क मेरा है पिघलता दरिया

रूह-बदन गर मिल जाएं दोनों के
दिल बन जाएगा मचलता दरिया

टूटेंगी अगर ये रस्मों की दीवारें
इश्क बन जाएगा चलता दरिया

मत हो खफा तू मेरी वफा से
हिलने दे वफा का हिलता दरिया

बिन हर्फों के 'राकेश' कैसे लिक्खें
रूका है ग़ज़ल का चलता दरिया

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