सारी जिन्दगी जीते रहे हम ख्वाबों में
होती नहीं खुशबू कभी काग़जी गुलाबों में
जुदा हो गए हम मिलने से पहले ही
कुछ तो रही है कमी हमारे भी हिसाबों में
भूल हो गई हमसे उनको समझने में ही
छिपा रखा था उसने खुद को जो हिज़ाबों में
न रहा कोई हमसे मुहब्बत करने वाला अब
हम भी तो हैं अब जहां के खाना खराबों में
मुहब्बत में वो सब नज़र नहीं आया कभी
हमने जो कुछ भी पढ़ा था किताबों में
मरता नहीं कोई.....
मरता नहीं कोई किसी से जुदा होने पर
अफसोस जरूर होता है किसी को खोने पर
लम्हात जो होते हैं बीते हुए जमानों के
घेर लेते हैं अक्सर तनहा होने पर
होने लगता है अहसास गमों में खुशी का
जिन्दगी आसान लगती है तज़र्बा होने पर
कौन क्या है और कितने पानी में है
लगता है पता सामने आईना होने पर
दिल में कितनी मुहब्बत है किसके लिए
पता लगता है अक्सर जुदा होने पर
अफसोस जरूर होता है किसी को खोने पर
लम्हात जो होते हैं बीते हुए जमानों के
घेर लेते हैं अक्सर तनहा होने पर
होने लगता है अहसास गमों में खुशी का
जिन्दगी आसान लगती है तज़र्बा होने पर
कौन क्या है और कितने पानी में है
लगता है पता सामने आईना होने पर
दिल में कितनी मुहब्बत है किसके लिए
पता लगता है अक्सर जुदा होने पर
दर्दे दिल है....
दर्दे दिल है और आँखों में पानी है
हाँ यही, बस यही, मेरी कहानी है
ऐ खुदा रखना हरा इसको सदा
यह जख्म दोस्त की दी निशानी है
जानी है जबसे हकीकत उसकी
ये दुनिया लगने लगी बेगानी है
मेरा तज़रबा तो कहता है यही
छोटी उमर में इश्क करना नादानी है
सबके इश्क में मिलेगी-बू-ए-हवस
'राकेश' का इश्क उल्फते-रूहानी है
हाँ यही, बस यही, मेरी कहानी है
ऐ खुदा रखना हरा इसको सदा
यह जख्म दोस्त की दी निशानी है
जानी है जबसे हकीकत उसकी
ये दुनिया लगने लगी बेगानी है
मेरा तज़रबा तो कहता है यही
छोटी उमर में इश्क करना नादानी है
सबके इश्क में मिलेगी-बू-ए-हवस
'राकेश' का इश्क उल्फते-रूहानी है
धीरे-धीरे चलना होगा....
धीरे-धीरे चलना होगा
गिरकर भी संभलना होगा
जीवन के इस राह में यारों
गमों से भी मिलना होगा
बिछड़े हैं जो आज भी हमसे
कल उनसे भी मिलना होगा
गम मिले या खुशियाँ हमको
फूलों जैसा हँसना होगा
जब तक सांस है बाकी
यादों में ही जलना होगा
गिरकर भी संभलना होगा
जीवन के इस राह में यारों
गमों से भी मिलना होगा
बिछड़े हैं जो आज भी हमसे
कल उनसे भी मिलना होगा
गम मिले या खुशियाँ हमको
फूलों जैसा हँसना होगा
जब तक सांस है बाकी
यादों में ही जलना होगा
मुझको तुम अपना...
मुझको तुम अपना कहते हो
इसीलिए अच्छे लगते हो
जिससे मैंने धोखा खाया
तुम भी बिल्कुल उन जैसे हो
कैसे मानूँ बात मैं तेरी
तुम तो दुनिया के झूठे हो
तुम तो चाहो दौलत-शोहरत
कदर वफा की कब करते हो
तुमको प्यार पे यकीं नहीं है
कल उसके थे, अब इसके हो
सच को सच कहते हो
सबको तुम कड़वे लगते हो
इसीलिए अच्छे लगते हो
जिससे मैंने धोखा खाया
तुम भी बिल्कुल उन जैसे हो
कैसे मानूँ बात मैं तेरी
तुम तो दुनिया के झूठे हो
तुम तो चाहो दौलत-शोहरत
कदर वफा की कब करते हो
तुमको प्यार पे यकीं नहीं है
कल उसके थे, अब इसके हो
सच को सच कहते हो
सबको तुम कड़वे लगते हो
मैं ख्वाबों से निकलना...
मैं ख्वाबों से निकलना चाहता हूँ
तुम्हारे साथ-साथ चलना चाहता हूँ
दर्द है क्या, समझाने की खातिर
मैं तुमसे दिल बदलना चाहता हूँ
जिया हूँ मैं इक पत्थर की तरह
अब बनके मोम जलना चाहता हूँ
वफा करने से कुछ हासिल नहीं है
जफा में अब, मैं पलना चाहता हँ
गमों में तो जला हूँ मैं अब
तेरी खुशियों में ढलना चाहता हूँ
तुम्हारे साथ-साथ चलना चाहता हूँ
दर्द है क्या, समझाने की खातिर
मैं तुमसे दिल बदलना चाहता हूँ
जिया हूँ मैं इक पत्थर की तरह
अब बनके मोम जलना चाहता हूँ
वफा करने से कुछ हासिल नहीं है
जफा में अब, मैं पलना चाहता हँ
गमों में तो जला हूँ मैं अब
तेरी खुशियों में ढलना चाहता हूँ
अब तो वक्त कुछ.....
अब तो वक्त कुछ यूँ गुजारना होगा
अहसां जिन्दगी का उतारना होगा
साथ मेरे कोई चले न चले
खुद को तूफां में उतारना होगा
किसी में बुराई देखने से पहले
हमें खुद को भी तो संवारना होगा
यकीनन दौरे-इश्क आएगा मगर
दिल से इस नफरत को मारना होगा
गर तनहा सफर नहीं होता
अब हमसफर को पुकारना होगा
अहसां जिन्दगी का उतारना होगा
साथ मेरे कोई चले न चले
खुद को तूफां में उतारना होगा
किसी में बुराई देखने से पहले
हमें खुद को भी तो संवारना होगा
यकीनन दौरे-इश्क आएगा मगर
दिल से इस नफरत को मारना होगा
गर तनहा सफर नहीं होता
अब हमसफर को पुकारना होगा
इन्सां को मुहब्बत....
पत्थरों पे कर लेना तुम यकीं
लेकिन इन्सानों पर करना नहीं
इन्सां को मुहब्बत मिले जहां से
करता है ये दगा, आखिर वहीं
खुदा-ए-इश्क तुम कहते हो जिसे
मतलबे-इश्क तक उसे पता नहीं
उजले जिस्म की चाह रखने वालों
कीमते-साफदिल तुम्हें पता नहीं
आस न छोड़ उससे इंसाफ की
खुदा के घर देर है अंधेर नहीं
लेकिन इन्सानों पर करना नहीं
इन्सां को मुहब्बत मिले जहां से
करता है ये दगा, आखिर वहीं
खुदा-ए-इश्क तुम कहते हो जिसे
मतलबे-इश्क तक उसे पता नहीं
उजले जिस्म की चाह रखने वालों
कीमते-साफदिल तुम्हें पता नहीं
आस न छोड़ उससे इंसाफ की
खुदा के घर देर है अंधेर नहीं
तुमसे पहले मैंने....
तुमसे पहले मैंने किसी पे यकीं किया न था
इस धोखे से पहले कोई धोखा हुआ न था
तेरी नजरों का स्पर्श दिल में घर कर गया
तुमसे पहले तो किसी ने इस तरह देखा न था
क्या पता कैसी होती हैं बियाबान की रातें
शाम के बाद घर से मैं कभी निकला न था
अब मैं समझा उसकी इस नाकामयाबी का सबब
हौसला करके वो पूरा राह पे चला न था
इन हुस्न वालों से न रखिए वफा की उम्मीद
वक्त पे देंगे ये धोखा यह कहता न था
इस धोखे से पहले कोई धोखा हुआ न था
तेरी नजरों का स्पर्श दिल में घर कर गया
तुमसे पहले तो किसी ने इस तरह देखा न था
क्या पता कैसी होती हैं बियाबान की रातें
शाम के बाद घर से मैं कभी निकला न था
अब मैं समझा उसकी इस नाकामयाबी का सबब
हौसला करके वो पूरा राह पे चला न था
इन हुस्न वालों से न रखिए वफा की उम्मीद
वक्त पे देंगे ये धोखा यह कहता न था
हमसे हर किसी ने
हमसे हर किसी ने बस इतना ही वास्ता रक्खा
सिर्फ गरज के लिए ही हमको अपना आशना रक्खा
हमने जिसको भी चाहा, तहे दिल से चाहा मगर
सभी ने दिलों के दरमियां सदा फासिला रक्खा
जहाँ तक याद है, मैंने सबसे वफा निभाईं है
फिर भी हर किसी ने मेरा नाम बेवफा रक्खा
असलियत जान जाएंगे तो लौट आएंगे वो भी
इसी आस में हमने दरवाजा-ए-दिल खुला रक्खा
अपनों के चेहरे भी आए नज़र बेगाने हमें
जब भी हमने उनके आगे आईना रक्खा
सिर्फ गरज के लिए ही हमको अपना आशना रक्खा
हमने जिसको भी चाहा, तहे दिल से चाहा मगर
सभी ने दिलों के दरमियां सदा फासिला रक्खा
जहाँ तक याद है, मैंने सबसे वफा निभाईं है
फिर भी हर किसी ने मेरा नाम बेवफा रक्खा
असलियत जान जाएंगे तो लौट आएंगे वो भी
इसी आस में हमने दरवाजा-ए-दिल खुला रक्खा
अपनों के चेहरे भी आए नज़र बेगाने हमें
जब भी हमने उनके आगे आईना रक्खा
ग़ज़ल : हुस्न तेरा इक...
हुस्न तेरा इक जलता दरिया
इश्क मेरा है पिघलता दरिया
रूह-बदन गर मिल जाएं दोनों के
दिल बन जाएगा मचलता दरिया
टूटेंगी अगर ये रस्मों की दीवारें
इश्क बन जाएगा चलता दरिया
मत हो खफा तू मेरी वफा से
हिलने दे वफा का हिलता दरिया
बिन हर्फों के 'राकेश' कैसे लिक्खें
रूका है ग़ज़ल का चलता दरिया
इश्क मेरा है पिघलता दरिया
रूह-बदन गर मिल जाएं दोनों के
दिल बन जाएगा मचलता दरिया
टूटेंगी अगर ये रस्मों की दीवारें
इश्क बन जाएगा चलता दरिया
मत हो खफा तू मेरी वफा से
हिलने दे वफा का हिलता दरिया
बिन हर्फों के 'राकेश' कैसे लिक्खें
रूका है ग़ज़ल का चलता दरिया
प्यार का ये पहला ही खत
प्यार का ये पहला ही खत है कोई बताए क्या-क्या लिखूँ
बातें दिल में आज बहुत हैं समझ न आए क्या-क्या लिखूँ
खत में पहले क्या लिखते हैं मुझको कुछ मालूम नहीं
तज़रबा नहीं खत लिखने का कोई बताए क्या-क्या लिखूँ
लिखकर उसका हाल मैं पूंछूं या अपना ही हाल कहूँ
कशमकश में हूँ बड़ी देर से समझ न आए क्या-क्या लिखूँ
नावाकिफ है जो उल्फत से मेरी अब तक उसे
राजे दिल मैं कैसे लिखूँ कोई बताए क्या-क्या लिखूँ
बातें दिल में आज बहुत हैं समझ न आए क्या-क्या लिखूँ
खत में पहले क्या लिखते हैं मुझको कुछ मालूम नहीं
तज़रबा नहीं खत लिखने का कोई बताए क्या-क्या लिखूँ
लिखकर उसका हाल मैं पूंछूं या अपना ही हाल कहूँ
कशमकश में हूँ बड़ी देर से समझ न आए क्या-क्या लिखूँ
नावाकिफ है जो उल्फत से मेरी अब तक उसे
राजे दिल मैं कैसे लिखूँ कोई बताए क्या-क्या लिखूँ
शाख़ से टूटकर पत्ते...
शाख़ से टूटकर पत्ते दोबारा नहीं चिपका करते
दिल से बनाए हुए रिश्ते कभी नहीं टूटा करते
पहला-पहला ये प्यार ही कुछ होता है ऐसा
दिले आशिक जिसको भूलकर भी नहीं भूला करते
प्यार करके वो मुझे भूल गए हो, कैसे मानूं
जो दिल में रहते हैं वो दिल से नहीं जाया करते
मौत तो आती है हमारे तुम्हारे जिस्मों को ही
प्यार के रिश्ते अमर हैं, ये नहीं टूटा करते
जो कहते हो सच कहते हो इसलिए हम
मुस्तहिके-रब्त तेरे सिवा ओर को नहीं समझा करते
दिल से बनाए हुए रिश्ते कभी नहीं टूटा करते
पहला-पहला ये प्यार ही कुछ होता है ऐसा
दिले आशिक जिसको भूलकर भी नहीं भूला करते
प्यार करके वो मुझे भूल गए हो, कैसे मानूं
जो दिल में रहते हैं वो दिल से नहीं जाया करते
मौत तो आती है हमारे तुम्हारे जिस्मों को ही
प्यार के रिश्ते अमर हैं, ये नहीं टूटा करते
जो कहते हो सच कहते हो इसलिए हम
मुस्तहिके-रब्त तेरे सिवा ओर को नहीं समझा करते
मुझको कलेजे से लगाए...
मुझको कलेजे से लगाए कोई
जिन्दगी में आप-सा आए कोई
बुझ सके न जो उमर भर के लिए
शम्मा-ए-इश्क ऐसी जलाए कोई
वादा करता हूँ हर खुशी दूंगा
मगर शर्त है वफा निभाए कोई
दिल में है जो वही चेहरे पे हो
हकीकत से रू-ब-रू कराए कोई
मेरी तमन्ना तो है यही
अपने दिल में मुझे बसाए कोई
जिन्दगी में आप-सा आए कोई
बुझ सके न जो उमर भर के लिए
शम्मा-ए-इश्क ऐसी जलाए कोई
वादा करता हूँ हर खुशी दूंगा
मगर शर्त है वफा निभाए कोई
दिल में है जो वही चेहरे पे हो
हकीकत से रू-ब-रू कराए कोई
मेरी तमन्ना तो है यही
अपने दिल में मुझे बसाए कोई
जब कभी तुम तनहा...
जब कभी तुम तनहा बैठोगे
खुद से होकर खफा बैठोगे
यादें मेरी घेरेंगी तुमको
दिल कर जब यकजा बैठोगे
होंगी तभी दूर सब कमियां
लेकर अगर आईना बैठोगे
सबकी नज़र से गिर जाओगे
होकर अगर बेवफा बैठोगे
खुदा भी न करेगा माफ तुम्हें
'राकेश' से अगर जुदा बैठोगे
खुद से होकर खफा बैठोगे
यादें मेरी घेरेंगी तुमको
दिल कर जब यकजा बैठोगे
होंगी तभी दूर सब कमियां
लेकर अगर आईना बैठोगे
सबकी नज़र से गिर जाओगे
होकर अगर बेवफा बैठोगे
खुदा भी न करेगा माफ तुम्हें
'राकेश' से अगर जुदा बैठोगे
बेशक मुझसे आज...
बेशक मुझसे आज खफा है
वो जैसा भी है मेरा है
कहने से नहीं टूटते रिश्ते
अपना तो अपना होता है
जीवन में रूठने मनाने का
अपना इक अलग मजा है
वह रूठे हैं तो मन जाएंगे
न मैं बुरा हूँ न वो बुरा है
कहती हैं ये हिचकियां मुझको
याद मुझे वो भी करता है
नींद नहीं मुझको भी आती
वो भी तो तारे गिनता है
मांगी दुआ तुम्हें पाने की
टूटा जब कोई तारा है
तू मिले तो सब मिला समझूं
'राकेश' मुझे जग से क्या लेना है
वो जैसा भी है मेरा है
कहने से नहीं टूटते रिश्ते
अपना तो अपना होता है
जीवन में रूठने मनाने का
अपना इक अलग मजा है
वह रूठे हैं तो मन जाएंगे
न मैं बुरा हूँ न वो बुरा है
कहती हैं ये हिचकियां मुझको
याद मुझे वो भी करता है
नींद नहीं मुझको भी आती
वो भी तो तारे गिनता है
मांगी दुआ तुम्हें पाने की
टूटा जब कोई तारा है
तू मिले तो सब मिला समझूं
'राकेश' मुझे जग से क्या लेना है
तुम इक मुद्दत....
तुम इक मुद्दत बाद मिले हो
सुनाओ हमें तुम कैसे हो
दिल में रहना छोड़ा तूने
फिर आजकल कहाँ रहते हो
आज भी हमसे रूठे हुए हो
तुम बिल्कुल भी नहीं बदले हो
कह दो जो कुछ भी है कहना
चुपचाप होकर क्यों खड़े हो
लगते हो 'राकेश' तुम भी पागल
जहाँ छोड़ा था वहीं खड़े हो
सुनाओ हमें तुम कैसे हो
दिल में रहना छोड़ा तूने
फिर आजकल कहाँ रहते हो
आज भी हमसे रूठे हुए हो
तुम बिल्कुल भी नहीं बदले हो
कह दो जो कुछ भी है कहना
चुपचाप होकर क्यों खड़े हो
लगते हो 'राकेश' तुम भी पागल
जहाँ छोड़ा था वहीं खड़े हो
जिगर में रहकर भी....
जिगर में रहकर भी वो जुदा हो जैसे
मगर फिर भी लगे है अपना हो जैसे
मिलता भी है तो ऐसे मिलता है वो
दरमियां जन्मों का फासिला हो जैसे
उसके लिए सबसे लड़ने चला, तो लगा
उसका इश्क मेरा हौसला हो जैसे
ख्वाबों में भी नहीं आता वो आजकल
ऐसे लगता है भूल गया हो जैसे
किसी पे कभी एतबार करके तो देख
लगेगा पत्थर में भी, खुदा हो जैसे
तेरी बातों से साफ पता चलता है
'राकेश' तुमने भी प्यार किया हो जैसे
मगर फिर भी लगे है अपना हो जैसे
मिलता भी है तो ऐसे मिलता है वो
दरमियां जन्मों का फासिला हो जैसे
उसके लिए सबसे लड़ने चला, तो लगा
उसका इश्क मेरा हौसला हो जैसे
ख्वाबों में भी नहीं आता वो आजकल
ऐसे लगता है भूल गया हो जैसे
किसी पे कभी एतबार करके तो देख
लगेगा पत्थर में भी, खुदा हो जैसे
तेरी बातों से साफ पता चलता है
'राकेश' तुमने भी प्यार किया हो जैसे
नींव पड़ी थी.....
नींव पड़ी थी अपने रिश्तों की
बात हो जैसे कई बरसों की
मिलते थे जहाँ पे छुप-छुप के
याद है, बाड़ थी वह सरसों की
बिछुड़े मुद्दत हुई हमें फिर भी
बात लगती है कल-परसों की
तुम तो इक साल भी न साथ चले
बात करते थे सात-जन्मों की
बारहा उसकी याद जो लाएं
छोड़िये बात ऐसे सपनों की
जब भी दिया हमको गम ही दिया
क्या कहें 'राकेश' ऐसे अपनों की
बात हो जैसे कई बरसों की
मिलते थे जहाँ पे छुप-छुप के
याद है, बाड़ थी वह सरसों की
बिछुड़े मुद्दत हुई हमें फिर भी
बात लगती है कल-परसों की
तुम तो इक साल भी न साथ चले
बात करते थे सात-जन्मों की
बारहा उसकी याद जो लाएं
छोड़िये बात ऐसे सपनों की
जब भी दिया हमको गम ही दिया
क्या कहें 'राकेश' ऐसे अपनों की
मेरे खत का.....
मेरे खत का कुछ यूँ जवाब भेजा है
बंद लिफाफे में लाल गुलाब भेजा है
बू-ए-वफा आ रही है इस गुल से
नए तौर से इश्क का ख़िताब भेजा है
जश्न का माहौल है आज मेरे दिल में
मेरे सवाल का सही जवाब भेजा है
मुरझाया हुआ चेहरा फिर खिल गया
मेरे लिए ईलाज-ए-इज्तिराब भेजा है
'राकेश' खोल दी है तेरी किस्मत उसने
बनाके हकीकत हर ख्वाब भेजा है
बंद लिफाफे में लाल गुलाब भेजा है
बू-ए-वफा आ रही है इस गुल से
नए तौर से इश्क का ख़िताब भेजा है
जश्न का माहौल है आज मेरे दिल में
मेरे सवाल का सही जवाब भेजा है
मुरझाया हुआ चेहरा फिर खिल गया
मेरे लिए ईलाज-ए-इज्तिराब भेजा है
'राकेश' खोल दी है तेरी किस्मत उसने
बनाके हकीकत हर ख्वाब भेजा है
करूं मैं तेरा इंतजार...
करूं मैं तेरा इंतजार कब तक आखिर कब तक
चलेंगी ये साँसे चार कब तक आखिर कब तक
मुझसे मिलने का इरादा तो बना, कोशिश तो कर
सोएंगे ये पहरेदार कब तक आखिर कब तक
मुझे अब ओर कोई काम नहीं इस जिद्द के सिवा
होगा न तेरा दीदार कब तक आखिर कब तक
कभी न कभी तो आएगा दौर उल्फ़ते-रूहानी का
ज़िस्म बिकेगा सरे बाज़ार कब तक आखिर कब तक
शबे-तार भी हो जाती है तबदील सुबह में 'राकेश'
फिर मुझे न मिलेगा प्यार कब तक आखिर कब तक
चलेंगी ये साँसे चार कब तक आखिर कब तक
मुझसे मिलने का इरादा तो बना, कोशिश तो कर
सोएंगे ये पहरेदार कब तक आखिर कब तक
मुझे अब ओर कोई काम नहीं इस जिद्द के सिवा
होगा न तेरा दीदार कब तक आखिर कब तक
कभी न कभी तो आएगा दौर उल्फ़ते-रूहानी का
ज़िस्म बिकेगा सरे बाज़ार कब तक आखिर कब तक
शबे-तार भी हो जाती है तबदील सुबह में 'राकेश'
फिर मुझे न मिलेगा प्यार कब तक आखिर कब तक
खुद को मेरा दोस्त....
खुद को मेरा दोस्त बताने वाले
तुम भी निकले मुझे सताने वाले
झूठे भी हो तुम फरेबी भी हो
सब हुनर हैं तुझमें जमाने वाले
पाँचों उंगलियाँ बराबर नहीं होती
बेवजह मुझको बुरा बताने वाले
मेरे दीदार को तरसते थे कभी
आज हमसे यूँ नज़र चुराने वाले
दिल आसूदा है, तेरा दर्द पाकर भी
ओ बन्दा-नवाज मुझे भुलाने वाले
दिल मुश्ताक़े दीद है 'राकेश' का
मुझको यादों से मिटाने वाले
तुम भी निकले मुझे सताने वाले
झूठे भी हो तुम फरेबी भी हो
सब हुनर हैं तुझमें जमाने वाले
पाँचों उंगलियाँ बराबर नहीं होती
बेवजह मुझको बुरा बताने वाले
मेरे दीदार को तरसते थे कभी
आज हमसे यूँ नज़र चुराने वाले
दिल आसूदा है, तेरा दर्द पाकर भी
ओ बन्दा-नवाज मुझे भुलाने वाले
दिल मुश्ताक़े दीद है 'राकेश' का
मुझको यादों से मिटाने वाले
ग़ज़ल : दिल बना है मेरा
दिल बना है मेरा शायद गम छिपाने को
आँखें दी हैं खुदा ने आँसू बहाने को
जब से छोड़ा है उसने मुझ दीवाने को
प्यारा लगने लगा हूँ मैं भी जमाने को
उसकी जरूरत है न उसका प्यार लाज़मी
है उसकी याद बहुत दिल बहलाने को
वो नज़र न आई नज़र जो पहचाने मुझे
यूँ तो आँखें दी हैं खुदा ने जमाने को
जहाँ में और भी रहते हैं मेरे सिवा
सबको मिलता है क्यूँ 'राकेश' ही सताने को
आँखें दी हैं खुदा ने आँसू बहाने को
जब से छोड़ा है उसने मुझ दीवाने को
प्यारा लगने लगा हूँ मैं भी जमाने को
उसकी जरूरत है न उसका प्यार लाज़मी
है उसकी याद बहुत दिल बहलाने को
वो नज़र न आई नज़र जो पहचाने मुझे
यूँ तो आँखें दी हैं खुदा ने जमाने को
जहाँ में और भी रहते हैं मेरे सिवा
सबको मिलता है क्यूँ 'राकेश' ही सताने को
ग़ज़ल : अपना लीजिए
अपना लीजिए या ठुकरा दीजिए
फैसला आज मगर सुना दीजिए
अपना कहने में मुझे, आए गर हया तुझे
समझ जाऊँगा बस मुस्कुरा दीजिए
तुमको चाहता हो गर कोई मेरे सिवा
मुकाबला उसका मुझसे करा दीजिए
तेरी गोद में रखकर सिर सो जाऊँगा
मेरे बालों में हाथ फिरा दीजिए
जिंदगी जीने में आसान हो जायेगी
मये-मुहब्बत मुझको पिला दीजिए
सब कुछ अपना बना लीजे इश्क को
फर्क, धर्म, जात का ये मिटा दीजिए
शेख जी खुद को जो भी कहे पारसा
आईना आज उसको दिखा दीजिए
आने वाला है अब महफिल में 'राकेश'
कहीं दिल, कहीं पलकें बिछा दीजिए।
फैसला आज मगर सुना दीजिए
अपना कहने में मुझे, आए गर हया तुझे
समझ जाऊँगा बस मुस्कुरा दीजिए
तुमको चाहता हो गर कोई मेरे सिवा
मुकाबला उसका मुझसे करा दीजिए
तेरी गोद में रखकर सिर सो जाऊँगा
मेरे बालों में हाथ फिरा दीजिए
जिंदगी जीने में आसान हो जायेगी
मये-मुहब्बत मुझको पिला दीजिए
सब कुछ अपना बना लीजे इश्क को
फर्क, धर्म, जात का ये मिटा दीजिए
शेख जी खुद को जो भी कहे पारसा
आईना आज उसको दिखा दीजिए
आने वाला है अब महफिल में 'राकेश'
कहीं दिल, कहीं पलकें बिछा दीजिए।
ग़ज़ल : आँखों में बसा लीजे
आँखों में बसा लीजे
पलकों पे बिठा लीजे
सुर्खी बनाकर मुझको
होठों पे लगा लीजे
फूल बनाकर मुझको
बालों में सजा लीजे
चुनरी बनाकर मुझको
सीने से लगा लीजे
कंगना बनाकर मुझको
हाथों में सजा लीजे
बिंदिया बनाकर मुझको
माथे पर लगा लीजे
सिंदुर बनाकर मुझको
मांग में सजा लीजे
कुछ भी बना लीजे पर
मुझको अपना बना लीजे।
पलकों पे बिठा लीजे
सुर्खी बनाकर मुझको
होठों पे लगा लीजे
फूल बनाकर मुझको
बालों में सजा लीजे
चुनरी बनाकर मुझको
सीने से लगा लीजे
कंगना बनाकर मुझको
हाथों में सजा लीजे
बिंदिया बनाकर मुझको
माथे पर लगा लीजे
सिंदुर बनाकर मुझको
मांग में सजा लीजे
कुछ भी बना लीजे पर
मुझको अपना बना लीजे।
ग़ज़ल : चोरी-चोरी मुझको
चोरी-चोरी मुझको यूँ न देखा कर
क्या-क्या कहेंगे लोग जरा-समझा कर
नींद से बोझल हैं पलकें अब तलक तेरी
मेरी खातिर तू इतना भी न जागा कर
मुझे सोचने में कहीं भूल न जाओ खुद को ही
सोचाकर मुझे मगर इतना भी न सोचा कर
आना है तो आ जाओ जिन्दगी में मेरी
या फिर तू सपनों में भी न आया कर
इश्के-'राकेश' में रंगे-हकीकत नज़र आएगा
दिल को देखाकर, सूरत पे न जाया कर
क्या-क्या कहेंगे लोग जरा-समझा कर
नींद से बोझल हैं पलकें अब तलक तेरी
मेरी खातिर तू इतना भी न जागा कर
मुझे सोचने में कहीं भूल न जाओ खुद को ही
सोचाकर मुझे मगर इतना भी न सोचा कर
आना है तो आ जाओ जिन्दगी में मेरी
या फिर तू सपनों में भी न आया कर
इश्के-'राकेश' में रंगे-हकीकत नज़र आएगा
दिल को देखाकर, सूरत पे न जाया कर
ग़ज़ल : किताब-ए इश्क
किताब-ए इश्क पढ़ते रहना, शरहें, लिखते रहना
कागज-ए-दिल पे अपनी सारी बातें लिखते रहना
किसने तेरा गम बाँटा और किसने ताने दिए
तुमने जुदाई में कैसे काटी रातें लिखते रहना
यादों के तूफां उठे कब-कब दिल के समन्दर में
कब-कब बेताब हुई मिलने को धड़कनें लिखते रहना
जहन में क्या-क्या चली हैं बातें मुझको ले लेकर
तेरी आँखों ने क्या देखें, सपनें लिखते रहना
खोए हुए मेरे चेहरे को ढूँढा तुमने कब तक आखिर
ढूंढ रही थी कहाँ-कहाँ मुझको आँखें लिखते रहना
'गालिब' 'मीर' 'ज़ोक' की तरह जानेंगे लोग तुम्हें भी
जीवन के हर पहलू पे 'राकेश' ग़ज़लें लिखते रहना।
कागज-ए-दिल पे अपनी सारी बातें लिखते रहना
किसने तेरा गम बाँटा और किसने ताने दिए
तुमने जुदाई में कैसे काटी रातें लिखते रहना
यादों के तूफां उठे कब-कब दिल के समन्दर में
कब-कब बेताब हुई मिलने को धड़कनें लिखते रहना
जहन में क्या-क्या चली हैं बातें मुझको ले लेकर
तेरी आँखों ने क्या देखें, सपनें लिखते रहना
खोए हुए मेरे चेहरे को ढूँढा तुमने कब तक आखिर
ढूंढ रही थी कहाँ-कहाँ मुझको आँखें लिखते रहना
'गालिब' 'मीर' 'ज़ोक' की तरह जानेंगे लोग तुम्हें भी
जीवन के हर पहलू पे 'राकेश' ग़ज़लें लिखते रहना।
ग़ज़ल : आदत हो गई है
आदत हो गई है सबकी, जुबान से फिरना आजकल
हो गया है इक शौक, मुहब्बत करना आजकल
दिल हर रोज जाने कितने चेहरों पे मरता है
हो गया है किस कदर आसान मरना आजकल
ज़िस्म तक ही महदूद क्यों हो गई हर नज़र
क्यों नहीं चाहता कोई दिल में उतरना आजकल
मशहूर होने के लिए ये कैसा दीवानापन है
करते हैं पसन्द नज़रों से भी गिरना आजकल
आंख बंद करके यकीं कर लेते हो सब पर तुम
है बेवकूफी 'राकेश' ऐसा कुछ करना आजकल
हो गया है इक शौक, मुहब्बत करना आजकल
दिल हर रोज जाने कितने चेहरों पे मरता है
हो गया है किस कदर आसान मरना आजकल
ज़िस्म तक ही महदूद क्यों हो गई हर नज़र
क्यों नहीं चाहता कोई दिल में उतरना आजकल
मशहूर होने के लिए ये कैसा दीवानापन है
करते हैं पसन्द नज़रों से भी गिरना आजकल
आंख बंद करके यकीं कर लेते हो सब पर तुम
है बेवकूफी 'राकेश' ऐसा कुछ करना आजकल
कितने परवाने जले....
कितने परवाने जले राज ये पाने के लिये,
शमा जलने के लिये है या जलाने के लिये,
रोनेवाले तुझे रोने का सलिका भी नही,
अश्क पाने के लिये है या बहाने के लिये,
तुम तो नादान हो, ना समझोगे ये ज़ालिम दुनिया,
सर चढ़ा लेती है नजरों से गिराने के लिये,
आज करता हुं ये दर्द-ए-ग़म की शिकायत तुम से,
रोज आ जाती है कमबख्त सताने के लिये,
मुझको मालुम था आप आयेंगे मेरे घर पर,
खुद चला आया हुं मै याद दिलाने के लिये,
इश्क ने राज ये अब तक ना बताया है हमें,
सर झुकाने के लिये है या कटाने के लिये ।।।
शमा जलने के लिये है या जलाने के लिये,
रोनेवाले तुझे रोने का सलिका भी नही,
अश्क पाने के लिये है या बहाने के लिये,
तुम तो नादान हो, ना समझोगे ये ज़ालिम दुनिया,
सर चढ़ा लेती है नजरों से गिराने के लिये,
आज करता हुं ये दर्द-ए-ग़म की शिकायत तुम से,
रोज आ जाती है कमबख्त सताने के लिये,
मुझको मालुम था आप आयेंगे मेरे घर पर,
खुद चला आया हुं मै याद दिलाने के लिये,
इश्क ने राज ये अब तक ना बताया है हमें,
सर झुकाने के लिये है या कटाने के लिये ।।।
कभी तो लिखो ख़त...
कभी तो लिखो ख़त मुझे
कि मैं अभी मरा नहीं
अभी तो हुई लड़ाई है
बात कहाँ हो पाई है
दो चार लाईन लिख तो दो
बुरा भला कह तो दो
भड़ास दिल की निकाल लो
जी भर के मुझको कोस लो
नहीं तो कहोगी तुम सदा
कि मैंने कुछ कहा नहीं
नहीं नहीं नहीं नहीं
कभी तो लिखो ख़त मुझे
कि मैं अभी मरा नहीं
आँखें डबडबा रही
चाल डगमगा रही
ये दिल तुम्हें है सोचता
हर जगह है खोजता
जो तुम न मिल सकी अगर
तो कैसे कटेगी उमर
लाख मनाऊँ दिल को मैं
मगर दिल सम्हलता नहीं
नहीं नहीं नहीं नहीं
कभी तो लिखो ख़त मुझे
कि मैं अभी मरा नहीं
अधूरी बात छोड़ कर
मुझसे मुख मोड़ कर
जब से तुम रूठ गए
ख़्वाब सारे टूट गए
न जाने कैसे दिन ढले
कब और कैसे सांस चले
मैं सुध-बुध खो चुका
मुझे तो कुछ पता नहीं
नहीं नहीं नहीं नहीं
कभी तो लिखो ख़त मुझे
कि मैं अभी मरा नहीं
कि मैं अभी मरा नहीं
अभी तो हुई लड़ाई है
बात कहाँ हो पाई है
दो चार लाईन लिख तो दो
बुरा भला कह तो दो
भड़ास दिल की निकाल लो
जी भर के मुझको कोस लो
नहीं तो कहोगी तुम सदा
कि मैंने कुछ कहा नहीं
नहीं नहीं नहीं नहीं
कभी तो लिखो ख़त मुझे
कि मैं अभी मरा नहीं
आँखें डबडबा रही
चाल डगमगा रही
ये दिल तुम्हें है सोचता
हर जगह है खोजता
जो तुम न मिल सकी अगर
तो कैसे कटेगी उमर
लाख मनाऊँ दिल को मैं
मगर दिल सम्हलता नहीं
नहीं नहीं नहीं नहीं
कभी तो लिखो ख़त मुझे
कि मैं अभी मरा नहीं
अधूरी बात छोड़ कर
मुझसे मुख मोड़ कर
जब से तुम रूठ गए
ख़्वाब सारे टूट गए
न जाने कैसे दिन ढले
कब और कैसे सांस चले
मैं सुध-बुध खो चुका
मुझे तो कुछ पता नहीं
नहीं नहीं नहीं नहीं
कभी तो लिखो ख़त मुझे
कि मैं अभी मरा नहीं
मेरी महबूबा भी.....
मेरी महबूबा भी
कितनी बड़ी तोप है
आँखें चार किए हुए
हुए नहीं चार दिन
और हज़ारों खंजर का
थोप देती आरोप है
काश !
ये मैं पहले जान लेता
कि जो दे देती है दिल
वही फिर ले लेती है जान
जब बरसता
उसका प्रकोप है
पहले
वो जब खुश थी
तो रेन-फ़ारेस्ट की तरह सब्ज़ था
आजकल
गुस्सा है
तो ठंडा-ठंडा युरोप हैं
जल्लाद से भी बढ़कर
अगर कोई है
तो वो मेरी माशुका है
बिना अंतिम इच्छा पूछे ही
खींच लेती वो रोप है |||
==============================
रेन-फ़ारेस्ट = rain forest
सब्ज़ = हरा-भरा
युरोप = Europe
रोप = rope, रस्सी
==============================
कितनी बड़ी तोप है
आँखें चार किए हुए
हुए नहीं चार दिन
और हज़ारों खंजर का
थोप देती आरोप है
काश !
ये मैं पहले जान लेता
कि जो दे देती है दिल
वही फिर ले लेती है जान
जब बरसता
उसका प्रकोप है
पहले
वो जब खुश थी
तो रेन-फ़ारेस्ट की तरह सब्ज़ था
आजकल
गुस्सा है
तो ठंडा-ठंडा युरोप हैं
जल्लाद से भी बढ़कर
अगर कोई है
तो वो मेरी माशुका है
बिना अंतिम इच्छा पूछे ही
खींच लेती वो रोप है |||
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रेन-फ़ारेस्ट = rain forest
सब्ज़ = हरा-भरा
युरोप = Europe
रोप = rope, रस्सी
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क्यूँ तबीअत....
क्यूँ तबीअत कहीं ठहरती नहीं
दोस्ती तो उदास करती नहीं
हम हमेशा के सैर-चश्म सही
तुझ को देखें तो आँख भरती नहीं
शब-ए-हिज्राँ भी रोज़-ए-बद की तरह
कट तो जाती है पर गुज़रती नहीं
ये मोहब्बत है, सुन, ज़माने, सुन!
इतनी आसानियों से मरती नहीं
जिस तरह तुम गुजारते हो फ़राज़
जिंदगी उस तरह गुज़रती नहीं
दोस्ती तो उदास करती नहीं
हम हमेशा के सैर-चश्म सही
तुझ को देखें तो आँख भरती नहीं
शब-ए-हिज्राँ भी रोज़-ए-बद की तरह
कट तो जाती है पर गुज़रती नहीं
ये मोहब्बत है, सुन, ज़माने, सुन!
इतनी आसानियों से मरती नहीं
जिस तरह तुम गुजारते हो फ़राज़
जिंदगी उस तरह गुज़रती नहीं
होठों पे मोहब्बत....
होठों पे मोहब्बत के फसाने नही आते,
साहिल पे समुंद्र के खज़ाने नही आते.
पलके भी चमक उठती हैं सोते में हमारी,
आंखो को अभी ख्वाब छुपाने नहीं आते.
दिल उजडी हुई एक सराये की तरह है,
अब लोग यहा रात बिताने नही आते.
यारो नये मौसम ने ये एहसान किये है,
अब याद मुझे दर्द पुराने नही आते.
उडने दो परिंदो को अभी शोख हवा मे,
फिर लौट के बचपन के ज़माने नही आते.
इस शहर के बादल तेरी ज़ुल्फो की तरह है,
ये आग लगाते है, बुझाने नही आते.
एहबाब भी गैरो की अदा सीख गये है,
आते है मगर दिल को दुखाने नही आते.
साहिल पे समुंद्र के खज़ाने नही आते.
पलके भी चमक उठती हैं सोते में हमारी,
आंखो को अभी ख्वाब छुपाने नहीं आते.
दिल उजडी हुई एक सराये की तरह है,
अब लोग यहा रात बिताने नही आते.
यारो नये मौसम ने ये एहसान किये है,
अब याद मुझे दर्द पुराने नही आते.
उडने दो परिंदो को अभी शोख हवा मे,
फिर लौट के बचपन के ज़माने नही आते.
इस शहर के बादल तेरी ज़ुल्फो की तरह है,
ये आग लगाते है, बुझाने नही आते.
एहबाब भी गैरो की अदा सीख गये है,
आते है मगर दिल को दुखाने नही आते.
आपसे दोस्ती हम.....
आपसे दोस्ती हम यूं ही नही कर बैठे,
क्या करे हमारी पसंद ही कुछ "ख़ास" है. .
चिरागों से अगर अँधेरा दूर होता,
तोह चाँद की चाहत किसे होती.
कट सकती अगर अकेले जिन्दगी,
तो दोस्ती नाम की चीज़ ही न होती.
कभी किसी से जीकर ऐ जुदाई मत करना,
इस दोस्त से कभी रुसवाई मत करना,
जब दिल उब जाए हमसे तोह बता देना,
न बताकर बेवफाई मत करना.
दोस्ती सची हो तो वक्त रुक जता है
अस्मा लाख ऊँचा हो मगर झुक जता है
दोस्ती मे दुनिया लाख बने रुकावट,
अगर दोस्त सचा हो तो खुदा भी मान जता है.
दोस्ती वो एहसास है जो मिटती नही.
दोस्ती पर्वत है वोह, जोह झुकता नही,
इसकी कीमत क्या है पूछो हमसे,
यह वो "अनमोल" मोटी है जो बिकता नही . . .
सची है दोस्ती आजमा के देखो..
क्या करे हमारी पसंद ही कुछ "ख़ास" है. .
चिरागों से अगर अँधेरा दूर होता,
तोह चाँद की चाहत किसे होती.
कट सकती अगर अकेले जिन्दगी,
तो दोस्ती नाम की चीज़ ही न होती.
कभी किसी से जीकर ऐ जुदाई मत करना,
इस दोस्त से कभी रुसवाई मत करना,
जब दिल उब जाए हमसे तोह बता देना,
न बताकर बेवफाई मत करना.
दोस्ती सची हो तो वक्त रुक जता है
अस्मा लाख ऊँचा हो मगर झुक जता है
दोस्ती मे दुनिया लाख बने रुकावट,
अगर दोस्त सचा हो तो खुदा भी मान जता है.
दोस्ती वो एहसास है जो मिटती नही.
दोस्ती पर्वत है वोह, जोह झुकता नही,
इसकी कीमत क्या है पूछो हमसे,
यह वो "अनमोल" मोटी है जो बिकता नही . . .
सची है दोस्ती आजमा के देखो..
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