इक रात हुई बरसात बहुत,
मैं रोया सारी रात बहुत |
हर ग़म था ज़माने का लेकिन,
मैं तनहा था उस रात बहुत ||
फिर आँख से इक सावन बरसा,
जब सेहर हुई तो ख्याल आया |
वो बादल कितना तनहा था,
जो बरसा सारी रात बहुत ||||
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सौजन्य.......
कंचन (मेरी दोस्त)
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