ग़ज़ल : आँखों में बसा लीजे

आँखों में बसा लीजे
पलकों पे बिठा लीजे

सुर्खी बनाकर मुझको
होठों पे लगा लीजे

फूल बनाकर मुझको
बालों में सजा लीजे

चुनरी बनाकर मुझको
सीने से लगा लीजे

कंगना बनाकर मुझको
हाथों में सजा लीजे

बिंदिया बनाकर मुझको
माथे पर लगा लीजे

सिंदुर बनाकर मुझको
मांग में सजा लीजे

कुछ भी बना लीजे पर
मुझको अपना बना लीजे।

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