कितने परवाने जले....

कितने परवाने जले राज ये पाने के लिये,
शमा जलने के लिये है या जलाने के लिये,

रोनेवाले तुझे रोने का सलिका भी नही,
अश्क पाने के लिये है या बहाने के लिये,

तुम तो नादान हो, ना समझोगे ये ज़ालिम दुनिया,
सर चढ़ा लेती है नजरों से गिराने के लिये,

आज करता हुं ये दर्द-ए-ग़म की शिकायत तुम से,
रोज आ जाती है कमबख्त सताने के लिये,

मुझको मालुम था आप आयेंगे मेरे घर पर,
खुद चला आया हुं मै याद दिलाने के लिये,

इश्क ने राज ये अब तक ना बताया है हमें,
सर झुकाने के लिये है या कटाने के लिये ।।।

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